उसको चोरी चोरी छुप कर देखना भाता नहीं है ।।

क्या करूँ वह सामने खुलकर मेरे आता नहीं है ?

लोग सब दहशतज़दा हों देखकर मुझको मगर क्यों ,

धमकियों से भी वो मेरी टुक भी घबराता नहीं है ?

फाँसियों पर टाँगने वाला ज़रा सी भूल पर वो ,

क्यों गुनाहों पर भी मेरे मुझको मरवाता नहीं है ?

क्यों दुआएखै़र मेरे वास्ते करता फिरे वो ?

और क्यों….पूछूंँ तो अपना नाम बतलाता नहीं है ?

नाम पर नुक्स़ाँ के उमरा सर उठाते आस्मांँ को ,

लाल गुदड़ी का वो लुटपिट कर भी चिल्लाता नहीं है ।।

( दुआएख़ैर = कुशलता की कामना ,नुक़्साँ = घाटा , उमरा = अमीर लोग )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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