नंगे पांँवों जब काँटों पर चलना आता था ।।

तब मुझ को तक़्लीफ़ में भी बस हंँसना आता था ।।

उसके ग़म में सच कहता हूंँ हो जाता पागल ,

मेरी क़िस्मत मुझको ग़ज़लें कहना आता था ।।

उसने मुंँह से कब कुछ बोला रब का शुक्र करो ,

मुझ को बचपन से आंँखों को पढ़ना आता था ।।

उसकी जाने कैसी-कैसी पोलें खुल जातीं ,

वो तो राज़ मुझे सीने में रखना आता था ।।

वह तन कर ही रहता था तो कट बैठा जल्दी ,

मैं हूंँ सलामत मुझको थोड़ा झुकना आता था ।।

इंसाँँ हूंँ यह सोच किसी को फुफकारा भी कब ,

वरना मुझ को भी सांँपों सा डसना आता था ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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