ग़ज़ल : 265 – न पीते हैं पानी…..

अजीब हैं उजालों को शम्मा बुझाते ।। परिंदों के पर बांँधकर वो उड़ाते ।। हैं ख़ुद फूल-पत्ती से भी हल्के-फुल्के , मगर सर पे ईंट और पत्थर उठाते ।। वो आवाज़ देकर कभी भी न मुझको , इशारों से ही...Read more

ग़ज़ल : 264 – पेचोख़म

जब ज़ियादा मिल रहा क्यों कम मैं रख लूँँ ? है मयस्सर जब मज़ा क्यों ग़म में मैं रख लूँँ ? इक न इक दिन ज़ख्म तो वह देंगे आख़िर , क्यों न लेकर आज ही मरहम मैं रख लूँँ...Read more

ग़ज़ल : 263 – रागा करें

   एक भी दिन का कभी हरगिज़ न हम नागा करें ।। एक उल्लू और इक हम रात भर जागा करें ।। उनपे हम दिन रात बरसाते रहें चुन-चुन के फूल , हमपे वो गोले दनादन आग के दागा करें ।।...Read more

ग़ज़ल : 262 – पागल सरीखा

     उसको रोने का यक़ीनन हर सबब पुख़्ता मिला ।। फिर भी वह हर वक़्त लोगों को फ़क़त हंँसता मिला ।। मंज़िलों पर लोग सब आराम फ़रमाते मिले , वह वहाँँ भी कुछ न कुछ सच कुछ न कुछ...Read more