जब ज़ियादा मिल रहा क्यों कम मैं रख लूँँ ?

है मयस्सर जब मज़ा क्यों ग़म में मैं रख लूँँ ?

इक न इक दिन ज़ख्म तो वह देंगे आख़िर ,

क्यों न लेकर आज ही मरहम मैं रख लूँँ ?

इस क़दर प्यासी है सोचूँ इस नदी के

वास्ते बारिश के कुछ मौसम मैं रख लूँँ !!

उसकी क़िस्मत में नहीं का’बा पहुँँचना ,

क्यों ना क़त्रा भर उसे ज़मज़म मैं रख लूँँ ?

बस शराफ़त से बसर दुनिया में मुश्किल ,

क्यों न ख़ुद में थोड़े पेचोख़म मैं रख लूँँ ?

दुश्मनों के बीच रहने जा रहा हूँँ ,

क्या छुरे-चाकू व गोले-बम मैं रख लूँँ ?

 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *