अजीब हैं उजालों को शम्मा बुझाते ।।

परिंदों के पर बांँधकर वो उड़ाते ।।

हैं ख़ुद फूल-पत्ती से भी हल्के-फुल्के ,

मगर सर पे ईंट और पत्थर उठाते ।।

वो आवाज़ देकर कभी भी न मुझको ,

इशारों से ही क्यों हमेशा बुलाते ?

न पीते हैं पानी को जाकर कुओं पर ,

वो अंगार खा प्यास अपनी बुझाते ।।

वो किस्सा सुनें ग़ौर से ग़ैर का भी

न रोना किसी को भी अपना सुनाते ।।

कन्हैया हैं ले आड़ माखन की दरअस्ल ,

अरे गोपियों का वो दिल हैं चुराते ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *