ग़ज़ल : 257 – मक़्बरा

  बन सका चिकना न सब कुछ खुरदरा बनवा लिया ।। सबने ही मीनार हमने चौतरा बनवा लिया ।।1।। जब बना पाए न हम अपना मकाँ तो जीते जी , क़ब्र खुदवा अपनी अपना मक़्बरा बनवा लिया ।।2।। ज़ुर्म क्या गर...Read more

बड़ाकवि अटल

वो सियासी पूस की रातों का सूरज ढल गया ।। इक बड़ाकवि अटल नामक इस जगत से टल गया ।। राजनीतिक पंक में खिलता रहा जो खिलखिला , हाय ! वो सुंदर मनोहर स्वच्छ भोर कमल गया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 266 – ढोल बजाकर

आँसू उनकी आंँखों का चश्मा है गहना है ।। जिन लोगों का काम ही रोना रोते रहना है ।। झूठ है रोने से होते हैं ग़म कम या फिर ख़त्म , ढोल बजाकर ये सच दुनिया भर से कहना है...Read more