वो सियासी पूस की
रातों का सूरज ढल गया ।।
इक बड़ाकवि अटल नामक
इस जगत से टल गया ।।
राजनीतिक पंक में खिलता
रहा जो खिलखिला ,
हाय ! वो सुंदर मनोहर
स्वच्छ भोर कमल गया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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