मुक्त मुक्तक : 888 – भगवान बिक रहा है

क्या क्या न इस जहाँ में सामान बिक रहा है ? बकरा कहीं ; कहीं पर इंसान बिक रहा है ।। हैरान हूँ कि सब कुछ महँगा यहाँ है लेकिन , सस्ता दुकाँ दुकाँ में भगवान बिक रहा है ।।...Read more

ग़ज़ल : 268 – मेहँदियाँ

 मुझसे तुम दो ही पल भर सटी रह गयीं ।। सारी दुनिया की आँखें फटी रह गयीं ।। मैं गुटक कर ख़ुशी कद्दू होता गया , तुम चबा फ़िक्र को बरबटी रह गयीं ।। चाहकर बन सका मैं न सर्कस...Read more

मुक्त मुक्तक : 887 – धृतराष्ट्र

बैठे-ठाले मन रंजन को अपना धंधा बोल न तू ।। बोगनविलिया के फूलों को रजनीगंधा बोल न तू ।। जिनके मन के दृग हों फूटे , उनको कह धृतराष्ट्र बुला , किंतु कभी बस चर्म के चक्षु- विहीन को अंधा...Read more

गीत : 50 – हाथ काँधों पर नहीं

हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब , पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !! पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में , ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !! हाथ में लेकर...Read more

ग़ज़ल : 267 – तोप से बंदूक

तोप से बंदूक से इक तीर हो बैठा ।। नौजवानी में ही साठा पीर हो बैठा ।। चुप रहा तो बज गया दुनिया में गूँँगा वो , कह उठा तो सीधे ग़ालिब-मीर हो बैठा ।। बनके इक सय्याद रहता था...Read more