तोप से बंदूक से इक तीर हो बैठा ।।

नौजवानी में ही साठा पीर हो बैठा ।।

चुप रहा तो बज गया दुनिया में गूँँगा वो ,

कह उठा तो सीधे ग़ालिब-मीर हो बैठा ।।

बनके इक सय्याद रहता था वो जंगल में ,

आके दर्याओं में माहीगीर हो बैठा ।।

हिज़्र में दिन-रात सोते-जागते फिरते ,

रटते-रटते हीर…राँँझा हीर हो बैठा ।।

जो कहा करता था इश्क़ आज़ाद करता है ,

उसके ही पाँँवों की वह ज़ंजीर हो बैठा ।।

इस क़दर उसको सताया था ज़माने ने ,

वह छड़ी से लट्ठ फिर शमशीर हो बैठा ।।

उसने मर्यादा को अपनाया तो सच मानो ,

वह निरा रावण…खरा रघुवीर हो बैठा ।।

( साठा=साठ वर्ष का ,पीर=वृद्ध , सय्याद=चिड़ीमार ,

दर्या=नदी ,माहीगीर=मछली पकड़ने वाला ,हिज़्र=विरह ,

शमशीर=तलवार ,रघुवीर=रामचंद्र )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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