हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,

पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!

पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,

ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!

हाथ में लेकर चिरागों क्या मशालों को ,

ढूँँढने पर भी न पाओगे कहीं मुझसा ।।

मैं बुरा हूँँ या भला हूँँ इस ज़माने में ,

दूसरा हरगिज़ यहाँँ कोई नहीं मुझसा ।।

क्यों हूँँ मैं ? जानूँँ न मैं इतना मगर तय है ,

मैं अजब हूँँ ,मैं ग़ज़ब हूं ,मैं चुनिंदा हूँँ ।। 

हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,

पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!

पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,

ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!

वो ज़माना क्या हुआ जब मुझ से जुड़कर तुम ,

चाहते थे शह्र में मशहूर हो जाऊँँ ? 

कर रहे हो रात दिन ऐसे जतन अब क्यों ,

मैं तुम्हारी ज़िंदगी से दूर हो जाऊँँ ?

मत रगड़ , धो-धो मिटाने की करो कोशिश ,

दाग़ माथे का नहीं मैं एक बिंदा हूँँ ।।

हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,

पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!

पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,

ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!

( पर = पंख ; बिंदा = माथे पर लगाने वाली बड़ी गोल बिंदी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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