धर्मभीरु भर घृणा से करते हैं आपस में बत ।

धर्म से च्युत ईश्वर से सर्वथा हूँँ मैं विरत ।।

पूछते रहते हैं मैं क्यों नास्तिक हूँँ तो सुनो ।

पूर्णत: ध्यानस्थ होकर तथ्यत: सर्वस गुनो ।।

किंतु यह भी जान लो मैं यह कभी कहता नहीं ।

वह जिसे भगवान कहते सब जगह रहता नहीं ।।

पूर्णत: आश्वस्त हो निज सत्य को मैं धर रहा ।

सर्वथा है व्यक्तिगत अभिव्यक्त जो मैं कर रहा ।।

यह मेरी और उस ख़ुदा की शत्रुता का रूप है ।

जिसने मरुथल में मुझे जो धूप पर दी धूप है ।।

लोग कहते हैं कि उसके हाथ में हर बात है ।

वह जो चाहे सब छुड़ाले या वरे सौग़ात है ।।

वह असंभव को भी संभव चुटकियों में कर धरे ।

वह निपूतों की भी गोदी बाल बच्चों से भरे ।।

सच कहूँँ गुड़िया से भी प्यारी महज औलाद इक ।

हमने भी पाई थी कितनी मन्नतों के बाद इक ।।

यूँँ लगा जैसे मरुस्थल में हुई गंगा प्रकट ।

मिल गई अंधों को आँँखें भिक्षुओं को स्वर्णघट ।।

शुक्रिया रब का कभी करना ना हम भूले मगर ।

हो गया इक दिन ख़फ़ा जाने न वो किस बात पर ।।

सच कहूँँ सच्चाई से भी अत्यधिक सच्ची मेरी ।

अल्पवय में ही अचानक पुष्प सी बच्ची मेरी ।।

खेलते ही खेलते इक दिन अचानक यों गिरी ।

लाइलाज ऐसे भयानक रोग से वह जा घिरी ।।

विश्व में औषध नहीं ऐसे किसी बीमार की ।

डॉक्टर बोले ये बस पाहुन है दिन दो-चार की ।।

अस्पताल उसको लिए गोदी में हम फिरते रहे ।

बेचकर सब कुछ इलाज उसका मगर करते रहे ।।

रात-दिन करते रहे विश्वास रख रब से दुआ ।

पर चमत्कार ईश्वर की ओर से जब ना हुआ ।।

यूँँ लगे सीने में खंजर-तीर से धँसते हुए ।

उठ गई जिस दिन वो बेहोशी में भी हँसते हुए ।।

यों बिलख कर रोए हम पत्थर भी पानी हो गया ।

तब से नज़रों में हमारी रब भी फ़ानी हो गया ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

( एक मित्र के सतत अनुरोध पर यह कविता लिखी जिनकी प्राणप्रिय इकलौती पुत्री अल्पावस्था में ब्रेन ट्यूमर से इस जहाँ में नहीं रही )

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *