हमने अजीब ही कुछ फ़ित्रत है पायी यारों ।।

हर बात धीरे-धीरे-धीरे ही भायी यारों ।।

उस तक पलक झपकते हम मीलों दूर पहुँचे ,

वह दो क़दम भी हम तक बरसों न आयी यारों ।।

उसको तो मौत ने भी ख़ुशियाँ ही ला के बाँटीं ,

हमको तो ज़िंदगी भी बस ग़म ही लायी यारों ।।

भूखे रहे मगर हम इतना सुकूँ है हमने ,

औरों की छीनकर इक रोटी न खायी यारों ।।

बदली समंदरों पर जाकर बरसने वाली ,

हैराँ हूँ आज रेगिस्तानों पे छायी यारों ।।

ख़ुश हूँ कि ग़ुस्लख़ाने में आज उसने मेरी ,

दिल से ग़ज़ल तरन्नुम में गुनगुनायी यारों ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *