गीत : 52 – नववर्ष

किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।। जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।। व्यसनी तो करते सेवन ; हो ना हो कोई अवसर , कुछ लोग पान करते ; मदिरा का हर्ष में...Read more

ग़ज़ल : 283 – आशिक़ी

मुझको लगता है ये ज़ह्र खा , ख़ुदकुशी कर ना जाऊँ कहीं ? अगले दिन की करूँ बात क्या , आज ही कर ना जाऊँ कहीं ? है तो दुश्मन मेरा वो मगर , ख़ूबसूरत हसीं इस क़दर ; देखकर...Read more

मुक्तक : 943 – मिर्ची

मिर्ची ही गुड़ समझकर हँस-हँस चबा रहे हैं ।। तीखी है पर न आँखें टुक डबडबा रहे हैं ।। कुछ हो गया कि चाकू से काटते हैं पत्थर , पानी को मुट्ठियों में कस-कस दबा रहे हैं ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 942 – बादशाह

पागल नहीं तो क्या हैं अपने दुश्मनों को भी , जो मानते हैं तह-ए-दिल से ख़ैरख़्वाह हम ? करते हैं अपने बेवफ़ाओं को भी रात-दिन , सच्ची मोहब्बतें औ’ वह भी बेपनाह हम ।। किस डर से हम न जानें...Read more

मुक्तक : 941 – बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे , कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह , जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।। सोचता हूँ कि कितने मेरे सामने...Read more

मुक्तक : 940 – भूख

हाँ कई दिन से न था खाने को मेरे पास कुछ ।। आगे भी रोटी के मिलने की नहीं थी आस कुछ ।। भूख में इंसाँ को अपने मार मैं पशु बन गया , जाँ बचाने को चबाने लग गया...Read more