काग

चोंच से खींचकर काग आँचल तेरा ।। बोले उससे भी काला है काजल तेरा ।। रंग पूनम से उजला , अमावस लटें , मुख तो अमृत सा पर मन हलाहल तेरा ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 271- कनीज़

मैं तो सिर्फ़ एक कनीज़ हूँ ।। तुम्हें किस लिए फिर अज़ीज़ हूँ ? हूँ खिलौना मुझसे लो खेल लो , कि मैं आदमी नहीं चीज़ हूँ ।। मुझे तुम धुएँ में ले आए फिर , मैं दमा का जबकि...Read more

सिर काटेंगे

आकाश तड़ित सा लपक लपक दुश्मन पर गिर गिर काटेंगे ।। यदि आज नहीं यदि अभी नहीं तो हम किस दिन फिर काटेंगे ? अब आँख के बदले आँख नहीं ना हाथ हाथ के बदले में , अब तो अपनी...Read more