मैं तो सिर्फ़ एक कनीज़ हूँ ।।

तुम्हें किस लिए फिर अज़ीज़ हूँ ?

हूँ खिलौना मुझसे लो खेल लो ,

कि मैं आदमी नहीं चीज़ हूँ ।।

मुझे तुम धुएँ में ले आए फिर ,

मैं दमा का जबकि मरीज़ हूँ ।।

मुझे मारने का है हुक़्म उसे ,

कि मैं जिसका जानी हफ़ीज़ हूँ !!

न छुपाए पुश्त न सीना ही ,

मैं वो तार – तार कमीज़ हूँ ।।

न निगाह देख के मैली कर –

मुझे मैं बहुत ही ग़लीज़ हूँ ।।

न उठाके गोदी में ले मुझे ,

बड़ा भारी और दबीज़ हूँ ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *