ग़ज़ल : 273 – त्योहार

परेशाँ करने वालों को न ख़िदमतगार कहिएगा ।। बिठा पहरे पे चोरों को न चौकीदार कहिएगा ।। वतन के वास्ते जो जाँ हथेली पर लिए घूमें , न हों फ़ौजी भी तो उनको सिपहसालार कहिएगा ।। न चिनवाओ उन्हें ज़िंदा...Read more

रँग डाला……..

मैंने सत्य मानों प्रेमवश , बुरी तरह तुमको रँंग डाला ।। सच बोलूँ मैं माथ शपथ धर , बुरी तरह उनको रँंग डाला ।। किंतु हाय तुम दोनों ने मिल , इक प्रतिकार की भाँति पकड़ फिर , भाँति भाँति...Read more

दोहा ग़ज़ल

वो जब अपने सामने , पड़ जाते हैं यार ।। होश गवाँ करने लगें , हम उनके दीदार ।। हँसते हैं जब वो यही , होता है महसूस , जैसे खनकें पायलें , कोयल गाए मल्हार ।। जिनसे इश्क़ हक़ीक़तन...Read more

ग़ज़ल : 272 – मुक्का-लात

किस मज्बूरी के चलते यह बात हुई है ? जो अंधों के आगे नचते रात हुई है ।। हैराँ हूँ सुनकर इक बुलबुल के हाथों कल , अंबर में बाज़ों की भारी मात हुई है ।। झूठ है सिर्फ़ अमीर...Read more

मुक्तक

बुलाके पास जो आवारा क़िस्म कुत्ते को , खिलाके बिस्कुट और सिर्फ़ एक हड्डे को , सुनाने बैठ गया अपनी अनसुनी ग़ज़लें , अदब से वो भी खड़ा हो गया था सुनने को ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति  Read more