वो जब अपने सामने , पड़ जाते हैं यार ।।

होश गवाँ करने लगें , हम उनके दीदार ।।

हँसते हैं जब वो यही , होता है महसूस ,

जैसे खनकें पायलें , कोयल गाए मल्हार ।।

जिनसे इश्क़ हक़ीक़तन , करते हम कमबख़्त ,

वो ग़ैरों के प्यार में , रहते हैं बीमार ।।

उनके हिज्र में रात यों , बरसी आँखें दोस्त ,

ज्यों सावन में भी नहीं , होती धारासार ।।

उनकी खुशियों का वहाँ , कोई ओर न छोर ,

अपने भी ग़म का न याँ , दिखता पारावार ।।

उनकी आँख में आज भी , हम कोल्हू के बैल ,

पहले भी बेकार थे , अब भी हैं बेकार ।।

वह जब तक अपना रहा , दुनिया लगी हबीब ,

वह जब ग़ैर हुआ हुआ , ज्यों बैरी संसार ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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