मुक्त मुक्तक : 896 – देखते हैं

कि बेख़ौफ़ हो हम न डर देखते हैं ।। मचल कर तेरी रहगुज़र देखते हैं ।। तू दिख जाए खिड़की पे या अपने दर पर , तेरे घर को भर-भर नज़र देखते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्त मुक्तक : 895 – मुस्कुराहट

लोग कहते हैं मैं मुस्कुराता नहीं ।। मैं ये कहता हूँ मैं कुछ छुपाता नहीं ।। हर तरफ़ मुश्किलें , बंद राहें सभी ; कौन ऐसे में फिर मुँह बनाता नहीं ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्त मुक्तक : 894 – ख़्वाब

नींद नहीं जब-जब आती तब-तब बस ऐसे सोता मैं ।। लेटे-लेटे आँखें खोले सौ-सौ ख्व़ाब पिरोता मैं ।। भूले-भटके सच हो जाएँ तो नच-नच पागल न बनूँ , टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ तो भी ना रोता-धोता मैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 274 – सिर पे आफ़्ताब

न जब नशा मैं करूँ साथ क्यों शराब रखूँ ? लगे न प्यास तो हाथों में फिर क्यों आब रखूँ ? मैं सख़्त उम्मी हूँ दुनिया को यह पता है मगर , मैं अपने हाथों में हर वक़्त क्यों किताब...Read more

मुक्त मुक्तक : 893 – कोई देखे न………

जाने क्यों सिर पे लोहा उठा , जैसे फूलों को ढोता हूँ मैं ।। छटपटाऊँ न काँटों पे चल , बल्कि सच शाद होता हूँ मैं ।। तुम न मानोगे मैं बेतरह , कोई देखे न ऐसी जगह , आज...Read more

चौकीदार

उनके जिनके मंत्रियों से सीधे व्यवहार ।। करते उनमें से कई चोरी-भ्रष्टाचार ।। उस पर तुर्रा यह कि चढ़ मंचों पर बेशर्म , चिल्ला-चिल्ला बोलते हम हैं चौकीदार ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more