न जब नशा मैं करूँ साथ क्यों शराब रखूँ ?

लगे न प्यास तो हाथों में फिर क्यों आब रखूँ ?

मैं सख़्त उम्मी हूँ दुनिया को यह पता है मगर ,

मैं अपने हाथों में हर वक़्त क्यों किताब रखूँ ?

मुझे पसंद है दिन में भी तीरगी ही वले ,

तो क्यों मैं रात उठा सिर पे आफ़्ताब रखूँ ?

मैं इक नज़ीर हूँ दुनिया में मुफ़्लिसी की बड़ी ,

मुझे क्या हक़ है कि आँखों में फिर भी ख़्वाब रखूँ ?

वो मुझको चाहे न चाहे ये उसकी मर्ज़ी अरे ,

मैं उसको कितना करूँ प्यार क्यों हिसाब रखूँ ?

वो मुझको क़तरा भी रखता नहीं है देने कभी ,

मैं उसको सौंपने हर वक़्त क्यों तलाब रख़ूँ ?

तरसता है वो मेरे मैं भी उसके दीद को फिर ,

मिले कहीं वो मैं चेहरे पे क्यों हिजाब रखूँ ?

[ आब = जल // उम्मी = अनपढ़ // तीरगी = अंधकार // ले = किंतु // आफ़्ताब = सूर्य // नज़ीर = उदाहरण //मुफ़्लिसी = ग़रीबी // क़तरा = बूँद // दीद = दर्शन // हिजाब = घूँघट ]

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *