मुक्त मुक्तक : 899 – ग़ुस्सा

मेरे ग़ुस्से को फूँक – फूँक मत हवा दे तू ।। मैं भड़क जाऊँ उससे पहले ही बुझा दे तू ।। मैं बरस उट्ठा तो बहा के दुनिया रख दूँगा , अब्र को देख मेरे आस्माँ बना दे तू ।।...Read more

मुक्त मुक्तक : 898 – ज़ुर्म

ज़ुर्म वो साज़िशन रोज़ करते रहे ।। दूसरे उसका ज़ुर्माना भरते रहे ।। ज़ख़्म तो फूल ही दे रहे थे मगर , सारा इल्ज़ाम काँटों पे धरते रहे ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्त मुक्तक : 897 – मैं कहाँ हूँ ?

दिख रहा सबको वहीं बैठा जहाँ हूँ ।। हूँ वहीं पर वाँ मगर सचमुच कहाँ हूँ ? दिल मेरा आवारगी करता जिधर है , दरहक़ीक़त मैं यहाँ कब ? मैं वहाँ हूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more