मुक्तक

सब्र से कुर्सी पे भी सच बैठते कब हैं ? नींद भी लेते खड़े ही लेटते कब हैं ? हर तरफ़ माहौल बेशक़ ख़ूबसूरत है , आँख रखकर भी मगर हम देखते कब हैं ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 573 – अक़्ल

हैं उसके अक़्ल वाले द्वार बंद देखिए ।। लेकिन दयालुता भरी पसंद देखिए ।। करता है आज कौन उल्लुओं से दोस्ती , भैंसों से प्यार करता अक़्लमंद देखिए ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

पिताजी

पाँव मुझ लँगड़े के दोनों , हाथ मुझ करहीन के , आँख मुझ अंधे की दो , बहरे के दोनों कान हैं ।। यदि कोई मुझसे ये पूछे , हैं पिताजी क्या तेरे ? झट से कह दूँगा नहीं कुछ...Read more