पाँव मुझ लँगड़े के दोनों , हाथ मुझ करहीन के ,

आँख मुझ अंधे की दो , बहरे के दोनों कान हैं ।।

यदि कोई मुझसे ये पूछे , हैं पिताजी क्या तेरे ?

झट से कह दूँगा नहीं कुछ किंतु मेरे प्रान हैं ।।

माँ की महिमा तो जगत में व्याप्त है आरंभ से ,

किंतु क्या माहात्म्य कम है मातृ सम्मुख पितृ का ?

यदि पिताजी पर कोई मुझसे कहे दो शब्द लिख ,

सच तुरत लेकर कलम लिख दूँगा मैं भगवान हैं ।।

– डॉ. हीरालाल प्रजापति

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