मुक्तक : 908 – गर्मी की दोपहर

लाकर कहीं से उनपे बादलों को छाऊँ मैं ।। भरभर हिमालयों से बर्फ जल चढ़ाऊँ मैं ।। गर्मी की दोपहर के सूर्य से वो जल रहे , सोचूँ किसी भी तरह से उन्हें बुझाऊँ मैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 907 – छाता

आता हुआ मैं या फिर जाता ख़रीद लूँ ।। मन को हो नापसंद या भाता ख़रीद लूँ ।। लेकिन ये लाज़िमी है बाज़ार से कोई , बरसात आ रही इक छाता ख़रीद लूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 906 ( B ) – पत्तल

किस पाप की सख़्त सज़ा चुप ऐसे काट रहा है ? इतना भी है क्यों बेकस वो कभी जो लाट रहा है ? हैराँ हूँ कई पेटों का वो पालनहार ही आख़िर – क्यों ख़ुद भूख में जूठी पत्तल चाट...Read more

सेल्फ़ी

सब वफ़ादारी मेरी फिर आपकी , सिर्फ़ अपनापन ज़रा सा दीजिए ।। ख़ूबसूरत मैं भी हूँ मुझ पर अगर , प्यार से अपनी नज़र इक कीजिए ।। कुछ नहीं सचमुच नहीं कुछ आज बस , चाहता हूँ आप अपने हाथ...Read more

मुक्तक : 906 – बोलो न अहमक़

  जो बेमौत मारे गए या मरे ख़ुद , उन्हें तुम किसी हक़ से बोलो न अहमक़ !! गर इतना जो हो जाता दुनिया में शायद , ज़मीं ही फिर हो जाती जन्नत बिलाशक़ !! नदी-कूप पर होता प्यासों का...Read more

मुक्तक : 905 – तिरकिट

तिरकिट-धा-धिन-तिनक-धिन तबला बजा बजाकर ।। अख़बारी सुर्ख़ियों को पढ़-पढ़ सुना-सुनाकर ।। लेकिन वो अपने दर्दो- ग़म की कहानियों को , बेचे कभी न हरगिज़ आंँसू बहा बहा कर ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more