पथरीली सरज़मीं पर , कर-करके गहरे गड्ढे ,

फिर से न आएँ बाहर , ऐसे मैं गाड़कर रे ।।

हरगिज़ भी कोई दर्जी , फिर से न सिल सके जो ,

कुछ इस तरह के टुकड़े , टुकड़ों में फाड़कर रे ।।

कुछ आपके वहाँ का , कुछ मेरे भी यहाँ का ,

जानूँ न कैसा – कैसा , जाने कहाँ-कहाँ का ?

आँखों से अपनी चुन – चुन सारे मैं बेच घोड़े ,

सपनों का सारा कचरा सोता हूँ झाड़ कर रे ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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