तिरकिट-धा-धिन-तिनक-धिन

तबला बजा बजाकर ।।

अख़बारी सुर्ख़ियों को

पढ़-पढ़ सुना-सुनाकर ।।

लेकिन वो अपने दर्दो-

ग़म की कहानियों को ,

बेचे कभी न हरगिज़

आंँसू बहा बहा कर ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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