जो बेमौत मारे गए या मरे ख़ुद ,

उन्हें तुम किसी हक़ से बोलो न अहमक़ !!

गर इतना जो हो जाता दुनिया में शायद ,

ज़मीं ही फिर हो जाती जन्नत बिलाशक़ !!

नदी-कूप पर होता प्यासों का क़ब्ज़ा ,

ग़रीबों , फ़क़ीरों का दौलत पे कुछ हक़ ,

जो होता ज़रूरी वो पास होता सबके ,

तो फिर ख़ुदकुशीे क्यों कोई करता नाहक़ ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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