काँटे न थे हमेशा से , थे इक चमन कभी ।।

पत्थर से जिस्म वाले हम , थे गुलबदन कभी ।।

महफ़िल में भी रहे हम आके यक़्कोतन्हा आज ,

जो अपने आप में थे एक अंजुमन कभी ।।

चंद हादसों ने सच में क्या से क्या बना दिया ,

जैसे हैं आज वैसे तो न थे अपन कभी ।।

मिट्टी के ढेले बन के रह गए हैं आजकल ,

आता नहीं यक़ीं कि सच थे हम रतन कभी ।।

बारिश के रूठने से बन के नाली रह गए ,

हम भी थे दसियों साल पहले तक जमन कभी ।।

पीरी में सारी शोख़ियों ने अलविदा कहा ,

जोबन में हम में भी ग़ज़ब था बाँकपन कभी ।।

( यक़्कोतन्हा = नितांत अकेला , जमन = यमुना नदी , पीरी = वृद्धावस्था )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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