ग़ज़ल : 275 – गुलबदन

काँटे न थे हमेशा से , थे इक चमन कभी ।। पत्थर से जिस्म वाले हम , थे गुलबदन कभी ।। महफ़िल में भी रहे हम आके यक़्कोतन्हा आज , जो अपने आप में थे एक अंजुमन कभी ।। चंद...Read more