■ मुक्तक : 903 – गैया

अनुमान भी तुम सच न लगा पाओगे भैया ; किस धुन में मैं बैठा हूँ चराते हुए गैया ? दिखता हूँ किनारे पे मगर हूँ मैं भँवर में , क्या पार लगेगी रे मेरी कागज़ी नैया ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more