मुक्तक : 903 – गैया

  अनुमान भी तुम ना लगा सकोगे कि भैया , किस धुन में चराते हुए मैं बैठा हूँ गैया ? दिखता हूँ किनारे पे किंंतु हूँ मैं भँवर में , क्या पार लगेगी रे मेरी कागज़ी नैया ? -डॉ. हीरालाल...Read more