मुक्तक : 904 – फाड़कर

            पथरीली सरज़मीं पर , कर-करके गहरे गड्ढे , फिर से न आएँ बाहर , ऐसे मैं गाड़कर रे ।। हरगिज़ भी कोई दर्जी , फिर से न सिल सके जो , कुछ इस तरह...Read more