मुक्तक : 907 – छाता

आता हुआ मैं या फिर जाता ख़रीद लूँ ।। मन को हो नापसंद या भाता ख़रीद लूँ ।। लेकिन ये लाज़िमी है बाज़ार से कोई , बरसात आ रही इक छाता ख़रीद लूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more