मुक्तक : 904 – फाड़कर

            पथरीली सरज़मीं पर , कर-करके गहरे गड्ढे , फिर से न आएँ बाहर , ऐसे मैं गाड़कर रे ।। हरगिज़ भी कोई दर्जी , फिर से न सिल सके जो , कुछ इस तरह...Read more

मुक्तक : 903 – गैया

  अनुमान भी तुम ना लगा सकोगे कि भैया , किस धुन में चराते हुए मैं बैठा हूँ गैया ? दिखता हूँ किनारे पे किंंतु हूँ मैं भँवर में , क्या पार लगेगी रे मेरी कागज़ी नैया ? -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 902 – चकोरा

कब मेरी जानिब वो शर्माकर बढ़ेंगे यार ? जो मैं सुनना चाहूँ वो कब तक कहेंगे यार ? ज्यों चकोरा चाँद को देखे है सारी रात , इक नज़र भर भी मुझे वो कब तकेंगे यार ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 901- बैठ जाता हूँ

मैं उनके सामने ख़ुद को गिराकर बैठ जाता हूँ ।। उठे सर को सलीक़े से झुकाकर बैठ जाता हूँ ।। मुझे सर पर बिठाने वो रहें तैयार लेकिन मैं , हमेशा उनके क़दमों में ही जाकर बैठ जाता हूँ ।।...Read more

ग़ज़ल : 275 – गुलबदन

काँटे न थे हमेशा से , थे इक चमन कभी ।। पत्थर से जिस्म वाले हम , थे गुलबदन कभी ।। महफ़िल में भी रहे हम आके यक़्कोतन्हा आज , जो अपने आप में थे एक अंजुमन कभी ।। चंद...Read more

मुक्तक : 900 – ग़म का छुपाना

किसी गिर पड़े को झपट कर उठाना ।। किसी ज़ख़्म खाए को मरहम लगाना ।। ये आदत तुम्हारी नहीं ताज़ा-ताज़ा , है ये शौक़ तुममें निहायत पुराना ।। हमें सब पता है कि क्या माज़रा है , कि क्या मग़्ज़े...Read more