मुक्तक : 915 – ग़ुस्सा

रेलगाड़ी गुज़रे जर्जर पुल से ज्यों कोई , इस तरह दिल देख उसको धड़धड़ाता है ।। तक मुझे ता’नाज़नी करता वो कुछ ऐसी , कान में पिघला हुआ ज्यों काँच जाता है ।। मैं न ग़ुस्सेवर ज़रा पर पार कर...Read more

मुक्तक : 914 – मरीज़-ए-इश्क़

मैंने माना मैं मरीज़-ए-इश्क़ तेरा , और तू मेरे लिए बीमार है , हाँ ।। दरमियाँ अपने मगर सदियों पुरानी ; एक पक्की चीन की दीवार है , हाँ ।। इक बड़ा सा फ़र्क़ तेरी मेरी हस्ती ; ज़ात ,...Read more

तिरंगा

बात करता है तिरंगे को जलाने की ।। कोशिशें करता है भारत को मिटाने की ।। ये सितारा-चाँद हरे रँग पर जड़े झण्डा , सोचता है बंद हवा में फरफराने की ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

■ मुक्तक : 912 – तस्वीर

धागा भी हो गया इक ज़ंजीर आज तो ।। काँटा भी लग रहा है शमशीर आज तो ।। कल तक की भीगी बिल्ली बन बैठी शेरनी , तब्दीलियों की देखो तस्वीर आज तो ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 913 – स्वप्न

दादुर उछल शिखी को नचना सिखा रहा है ।। ज्ञानी को अज्ञ अपनी कविता लिखा रहा है ।। उठ बैठा चौंककर मैं जब स्वप्न में ये देखा , इक नेत्रहीन सुनयन को अँख दिखा रहा है ।। ( दादुर =...Read more

गीत : 49 – दिल जोड़ने चले हो

दिल जोड़ने चले हो ठहरो ज़रा संँभलना ।। टूटे हैं दिल हज़ारों इस दिल्लगी में वर्ना ।। मासूमियत की तह में रखते हैं बेवफ़ाई । मतलब परस्त झूठी करते हैं आश्नाई । राहे वफ़ा में देखो यूँँ ही क़दम न...Read more