मैंने माना मैं मरीज़-ए-इश्क़ तेरा ,

और तू मेरे लिए बीमार है , हाँ ।।

दरमियाँ अपने मगर सदियों पुरानी ;

एक पक्की चीन की दीवार है , हाँ ।।

इक बड़ा सा फ़र्क़ तेरी मेरी हस्ती ;

ज़ात , मज़हब , शख्स़ियत , औक़ात में है ,

यूँ समझ ले मैं हूँ इक अद्ना सी मंज़िल ;

तू फ़लकबोस इक कुतुबमीनार है , हाँ ।।

( दरमियाँ = मध्य , फ़लकबोस = गगनचुंबी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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