रेलगाड़ी गुज़रे जर्जर पुल से ज्यों कोई ,

इस तरह दिल देख उसको धड़धड़ाता है ।।

तक मुझे ता’नाज़नी करता वो कुछ ऐसी ,

कान में पिघला हुआ ज्यों काँच जाता है ।।

मैं न ग़ुस्सेवर ज़रा पर पार कर जाए ,

देखकर उसको मेरा सात आस्माँ ग़ुस्सा ,

जोंक बनकर जिसने मेरी ज़िंदगी चूसी ,

उसका पी जाने लहू मन कसमसाता है ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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