मुक्तक : 923 – मश्वरा

लेकर मशाल रौशन करने न चल पड़ो तुम उसको जो कोयले की इक खान है ; सँभलना ।। आँखों में नींद भर उस पर चल दिए हो सोने , बिस्तर सा वो नुकीली चट्टान है ; सँभलना ।। अंदर है...Read more

मुक्तक : 922 – नच रहा हूँ

तुम मानों या न मानों यह कह मैं सच रहा हूँ ।। बारिश में भीगने से हरगिज़ न बच रहा हूँ ।। दरअस्ल मैं किसी को नीचे दरख़्त के रुक , चोरी से नचते तक दिल ही दिल में नच...Read more

मुक्तक : 921 – गिर पड़ा हूँ

हैरान हो रहे हो , मैं कल सा फिर पड़ा हूँ ? हँसते ही हँंसते कैसे , अश्क़ों से घिर पड़ा हूँ ? मैं आज भी नशे में हूँ पर नहीं नशे से , ठोकर किसी के धोख़े की खा...Read more

मुक्तक : 920 – चाहत

तुम्हीं एक से जिस्म आहत कहाँ है ? किसी से भी इस दिल को राहत कहाँ है ? अगर ख़ुश नहीं हूँ तो ये मत समझना , अभी मुझमें हँसने की चाहत कहाँ है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 276 – जिद्दोजहद

बड़ी जिद्दोजहद से , कशमकश से , ख़ूब मेहनत से ।। न हो हैराँ मोहब्बत की है मैंने घोर नफ़रत से ।। 1 ।। हूंँ जो आज इस मुक़ाँ पर तो बड़ी ही मुश्क़िलों से हूँ , न इत्मीनान से...Read more

महामुक्तक : 919 – परिवर्तन

जो दिया करते थे सौग़ातों पे सौग़ातें , आज वो ही लूटने हमको मचलते हैं ।। जो हमारे सिर का सारा बोझ ढोते थे , अब वही पैरों तले हमको कुचलते हैं ।। जो लगे रहते थे सचमुच इक ज़माने...Read more