लेकर मशाल रौशन करने न चल पड़ो तुम

उसको जो कोयले की इक खान है ; सँभलना ।।

आँखों में नींद भर उस पर चल दिए हो सोने ,

बिस्तर सा वो नुकीली चट्टान है ; सँभलना ।।

अंदर है उसमें ज़िंदा ज्वालामुखी धधकता ,

लेकिन ज़ुबाँ से उसके ठंडा शहद टपकता ,

इक मश्वरा है उससे मत दोस्ती रखो सच ,

तुम झोंपड़ी हो वो इक तूफ़ान है ; सँभलना ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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