मुक्तक : 932 – अनगढ़

उतरता रहा हूँ कि चढ़ता रहा मैं ? मगर इतना तय है कि बढ़ता रहा मैं ।। कभी भी किसी बुत को तोड़ा न मैंने , हमेशा ही अनगढ़ को गढ़ता रहा मैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 279 – दुश्मन

कँवल जैसा खिला चेहरा वो कब दहशतज़दा होगा ? कब उस दुश्मन के पीछे एक पड़ा वहशी ददा होगा ? हमेशा मुस्कुराता है , सदा हँसता ही रहता है , वो दिन कब आएगा मेरा अदू जब ग़मज़दा होगा ?...Read more

ग़ज़ल : 278 – हल

जकड़ कर वो मुझसे उछल कह रहे हैं ।। मेरे काटकर पैर चल कह रहे हैं ।। क़लम क्या ज़रा सी लगे थामने बस , नहीं कुछ ग़ज़ल पर ग़ज़ल कह रहे हैं ।। न जाने है क्या उसमें उसको...Read more

दीर्घ मुक्तक : 931 – शिकंजा

उस जिस्म में बला की ख़ूबसूरती थी जो , सच इस क़दर किसी में ना दिखी भरी कभी ।। मलिका-ए-हुस्न थीं तमाम इस जहान में , देखी नहीं थी उस सी दूसरी परी कभी ।। उतरे थे इश्क़ में हम...Read more

मुक्तक : 930 – हँसी

यों तो ये सब जाने हैं हम कम ही हँसते हैं ; और ये भी है पता जब जब भी हँसते हैं ; ग़ालिबन फिर इस जहाँ के क़हक़हों पर भी , जो पड़े भारी ; हँसी कुछ ऐसी हँसते...Read more

मुक्तक : 929 – चुस्कियाँ

याद में ; यार की ; हिचकियाँ लींं गयीं ।। गीत गाते कई मुरकियाँ लींं गयीं ।। दिल हुआ गर नशे का तो दारू नहीं , प्याले में चाय की चुस्कियाँ लींं गयीं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more