माथे बीच लगी कालिख ,

छूने भर से अंधा बोले ,

मुझको तो यह हल्दी औ’

चंदन की रोली लगती है ।।

चपटी से भी चपटी कोई

ईंट बहुत ही दूरी से ,

तेज़ नज़र को भी शायद

पूछो तो गोली लगती है ।।

अक़्ल ज़रा सी जिनको ऊपर

वाले ने कुछ कम बख़्शी ;

आँखें दीं लेकिन उनमें ना

देखने की कुछ दम बख़्शी ;

ऐसों को हैरत क्या कंधों

पर चलने वाली अर्थी ,

यदि ख़ामोशी से बढ़ती

दुल्हन की डोली लगती है ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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