मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।

तव यौवन झूमें है लहलहा ।।

जैसी कल थी तू आकर्षक ।

उससे और अधिक अब हर्षक ।

तू सुंदर , अप्सरा , परी तू ।

उर्वशी , रंभा से भी खरी तू ।

मैं तेरे सम्मुख सच बंदर ।

किंतु मुझे तक उछल उछलकर ,

हाय लगा मत आज कहकहा ।।

मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।

तव यौवन झूमें है लहलहा ।।

मैं भी गबरू था बाँका था ,

तब तेरा मेरा टाँका था ,

रोजी-रोटी की तलाश में ,

मैं बदला जिंदा सी लाश में ,

अब तू इक राजा की रानी ,

तू मदिरा सम मैं बस पानी ,

बरसों बाद मिली है चुप कर ,

देख मुझे मत आज चहचहा ।।

मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।

तव यौवन झूमें है लहलहा ।।

– डॉ. हीरालाल प्रजापति

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