आजकल हालात ऐसे हो रहे हैं ,

मस्ख़रे भी खूँ के आँसू रो रहे हैं ।।

जागते रहिए ये कहने वाले प्रहरी ,

कुंभकरणी नींद में सब सो रहे हैं ।।

लोग सच्चे , हाल बदतर देख सच का ,

झूठ ही बच्चों में अपने बो रहे हैं ।।

खेलने की उम्र में कितने ही बच्चे ,

सर पे गारा , ईंट , पत्थर ढो रहे हैं ।।

वो उन्हें पाने की ज़िद में अपना सब कुछ ,

धीरे-धीरे , धीरे-धीरे खो रहे हैं ।।

भागते जाए हैं वो – वो हमसे कल तक ,

हमपे सौ जाँ से फ़िदा जो-जो रहे हैं ।।

दाग़ पेशानी के झूठे-सच्चे सारे ,

जितना मुमकिन उतना रो-रो धो रहे हैं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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