चलता है सैलाब लिए मौजों की रवानी माँगे है ।।

इक ऐसा दरिया है जो ख़ैरात में पानी माँगे है ।।

जंगल पर जंगल कटवाने-काटने वाला हैराँ हूँ ,

हाथ पसारे आज ख़ुदा से रुत मस्तानी माँगे है ।।

इश्क़-मोहब्बत से नफ़रत का रिश्ता रखने वाला क्यों ,

आज अकेले में रो-रो इक दिलबरजानी माँगे है ?

उसकी कोई बात सुनी ना जिसने सारी उम्र मगर ,

आज उसी से शख़्स वही उसकी ही कहानी माँगे है ।।

रोजी-रोटी के लाले जिसको वो कब सोना-चाँदी ,

वह ख़्वाबों में भी रब से बस दाना-पानी माँगे है ।।

हाय नज़र जिस ओर पड़े उस जानिब ज़ह्र दिखाई दे ,

बेशक़ अब दुनिया की फ़ज़ा बस औघड़दानी माँगे है।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *