जकड़ कर वो मुझसे उछल कह रहे हैं ।।

मेरे काटकर पैर चल कह रहे हैं ।।

क़लम क्या ज़रा सी लगे थामने बस ,

नहीं कुछ ग़ज़ल पर ग़ज़ल कह रहे हैं ।।

न जाने है क्या उसमें उसको जहाँ में ,

सिवा मेरे सब ही कँवल कह रहे हैं ?

मैं जैसा हूँ अच्छा हूँ लेकिन मुझे सब ,

जहाँ के मुताबिक़ बदल कह रहे हैं ।।

ज़रा भी न अब लड़खड़ाऊँ मैं फिर क्यों ,

अभी भी मुझे सब सँभल कह रहे हैं ?

अमीर अपने घर में ग़रीबी को घर से ,

बड़े ज़ोर चिल्ला निकल कह रहे हैं ।।

मेरी ; मेरे ; मेरे ही मुँह पर ग़ज़ब है ,

वफ़ादारियों को दग़ल कह रहे हैं !!

हुआ ख़ैरमक़्दम यूँ उनका मेरे घर ,

मेरी झोपड़ी वो महल कह रहे हैं ।।

ज़रा सा मैं उठने को क्या गिर गया हूँ ,

मरा वो मुझे आजकल कह रहे हैं ।।

सवालों पे मेरे , सवालों को अपने ,

वो मेरे सवालों का हल कह रहे हैं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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