कँवल जैसा खिला चेहरा वो कब दहशतज़दा होगा ?

कब उस दुश्मन के पीछे एक पड़ा वहशी ददा होगा ?

हमेशा मुस्कुराता है , सदा हँसता ही रहता है ,

वो दिन कब आएगा मेरा अदू जब ग़मज़दा होगा ?

कोई कब तक बचा रक्खेगा ख़ुद को हाय ! पीने से ,

किसी के घर के आगे ही खुला जब मैक़दा होगा ?

लतीफ़ों पर भी वह कैसे हँसेगा जिसकी क़िस्मत में ,

शुरू से लेके आख़िर तक अगर रोना बदा होगा ?

बचा कुछ भी न अब जब पास मेरे लुट गया सब कुछ ,

लिया मैंने जो उससे है वो फिर कैसे अदा होगा ?

ज़ुबाँ सचमुच कटालूँ गर ज़ुबाँ दे तू मुझे ; कल से ,

मेरी ख़ामोशियों की उम्र भर तू ही सदा होगा ।।

ज़मानत क्या कि मैं सब मार दूँ दुनिया के भिखमंगे ,

ज़माने में न फिर कोई नया पैदा गदा होगा ?

( दहशतज़दा = आतंकित , ददा = हिंसक दरिंदा , मैक़दा = शराबख़ाना , सदा = पुकार , आवाज़ , गदा = भिखारी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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