मुक्तक : 937 – ख़ूबसूरत

एक से बढ़कर हैं इक बुत , तुझसी मूरत कौन है ? हुस्न की दुनिया में तुझसा ख़ूबसूरत कौन है ? तू सभी का ख़्वाब , तू हर नौजवाँ की आर्ज़ू , ऐ परी ! लेकिन बता तेरी ज़रुरत कौन...Read more

ग़ज़ल : 282 – शंघाई

हूँ बहुत बदशक्ल कुछ रानाई लाकर दे ।। देख सब मुँह फेरें इक शैदाई लाकर दे ।। हर तरफ़ से बस नुकीला खुरदुरा ही हूँ , आह कुछ गोलाई , कुछ चिकनाई लाकर दे ।। बख़्श मत ऊँचाई बेशक़ बित्ते...Read more

ग़ज़ल : 281 – दिला

अजब इक ग़मज़दा के पीछे चलता क़ाफ़िला है ।। नहीं रोता कोई हर शख़्स का चेह्रा खिला है ।। जो कहता था न जी पाऊँगा इक दिन बिन तुम्हारे , वो सालों-साल से ख़ुश रह रहा मेरे बिला है ।।...Read more

दीर्घ मुक्तक : 936 – हाय

बस उसको देखते ही सच , कई सालों पुरानी इक , मैं अपनी ही क़सम का ख़ुद ही क़ातिल होने जाता हूँ ।। मोहब्बत में नहीं हरगिज़ पड़ूँगा ख़ूब सोचा था , मगर अब इश्क़ में हर वक़्त ग़ाफ़िल होने...Read more

■ मुक्तक : 935 – सूरज

जो पकड़ पाता नहीं खरगोश का बच्चा , अपनी इक मुट्ठी में गज-ऊरज पकड़ डाला ।। जो न गुब्बारा फुला सकता , बजाने को , आज उसने हाथ में तूरज पकड़ डाला ।। आज तो जानूँ न क्या-क्या मुझसे हो...Read more

ग़ज़ल : 280 – लफ़ड़ा है

बेसबब मेरा नहीं दुनिया से झगड़ा है ।। मुझको सच कहने की बीमारी ने जकड़ा है ।। गर वो अब मुझसे लड़ा सीधा पटक दूँगा , देखने में वो भले ही मुझसे तगड़ा है ।। दोनों तन्हाई में छुप-छुप मिलते...Read more