माँगा था मैंने उनसे जो चाह कर भी अब वे ,

मालूम है न हरगिज़ ला पाएँगे कभी रे ।।

रहता है फिर भी उनका ही इंतिज़ार भरसक ,

है जब पता न वे अब आ पाएँँगे कभी रे ।।

बनकर हमारी दुनिया ; दुनिया से जाने वाले ।

होकर हमारे हमको ,अपना बनाने वाले ।

करते न प्यार इतना गर जानते कि दिल से ,

शायद न जीते जी वे जा पाएँगे कभी रे।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *