बस उसको देखते ही सच ,

कई सालों पुरानी इक ,

मैं अपनी ही क़सम का ख़ुद

ही क़ातिल होने जाता हूँ ।।

मोहब्बत में नहीं हरगिज़

पड़ूँगा ख़ूब सोचा था ,

मगर अब इश्क़ में हर वक़्त

ग़ाफ़िल होने जाता हूँ ।।

न लैला का मुझे मजनूँ ,

न बनना हीर का राँझा ;

न मस्तानी का बाजीराव ,

ना फरहाद शीरीं का ;

करूँ क्या बन रही जो

फ़ेहरिस्त अब आशिक़ों वाली ,

मैं उसमें सबसे ऊपर हाय

शामिल होने जाता हूँ ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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