बेसबब मेरा नहीं दुनिया से झगड़ा है ।।

मुझको सच कहने की बीमारी ने जकड़ा है ।।

गर वो अब मुझसे लड़ा सीधा पटक दूँगा ,

देखने में वो भले ही मुझसे तगड़ा है ।।

दोनों तन्हाई में छुप-छुप मिलते , बतियाते ,

बीच में उनके यक़ीनन कुछ तो लफड़ा है ।।

मैं भी चिकना था मगर हालात ने मुझको ,

जाने किन-किन पत्थरों पर पटका-रगड़ा है ?

मर के भी मुझ में लचक उसके लिए बाक़ी ,

मेरी ख़ातिर अब भी वह मुर्दे सा अकड़ा है ।।

मुझसे बचकर भागने वाले ने जाने किस ,

रौ में बह ख़ुद आज मेरा हाथ पकड़ा है ?

और क्या सामान जीने लाज़मी मुझको ,

एक घर ,भरपेट रोटी , तन पे कपड़ा है ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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