अजब इक ग़मज़दा के पीछे चलता क़ाफ़िला है ।।

नहीं रोता कोई हर शख़्स का चेह्रा खिला है ।।

जो कहता था न जी पाऊँगा इक दिन बिन तुम्हारे ,

वो सालों-साल से ख़ुश रह रहा मेरे बिला है ।।

न जाने किस ग़लतफ़हमी में पड़ वो मुझसे रूठे ,

बता दें गर तो कर दूँ दूर जो शिक्वा-गिला है ।।

मैं जैसा भी हूँ अपनी वज़्ह से हूँ और ख़ुश हूँ ,

ये मेरा हाल मेरी हक़परस्ती का सिला है ।।

कोई कितना भी ताक़तवर हो लेकिन आदमी के ,

हिलाने से न इक पर्वत कभी कोई हिला है ।।

वो झूठा है जो कहता है कि उसने जो भी चाहा ,

उसे हर बार आगे-पीछे या अक्सर मिला है ।।

बना हो जो निखालिस और ख़ुशबूदार ज़र से ,

भला किसका यहाँ उसके सिवा वो दिल ; दिला है ।।

( बिला =बग़ैर , हक़परस्ती =सत्यनिष्ठा , ज़र =स्वर्ण , दिला =हे हृदय )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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