कहा मैंने गोरे से गोरे को काला ,

सताइश मैं अब सबकी खुलकर करूँगा ।।

महासूम बनकर रहा अब क़सम से ,

मैं फ़ैय्याज़ बस कर्ण जैसा बनूँगा ।।

अभी तक किसी के लिए ना किया कुछ ।

हमेशा लिया ही लिया ना दिया कुछ ।

अगर बख़्श दे मौत कुछ और दिन सच

मैं इस बार औरों की ख़ातिर जिऊंगा ।।

( सताइश = प्रशंसा , महासूम = बहुत बड़ा कंजूस , फ़ैय्याज़ = दानी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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